Friday, July 10, 2026

ईश्वर

युधिष्ठिर ने पूछा : वासुदेव ! आषाढ़ के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है? कृपया उसका वर्णन कीजिये । भगवान श्रीकृष्ण बोले : नृपश्रेष्ठ ! आषाढ़ (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार ज्येष्ठ ) के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘योगिनी’ है। यह बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है। संसारसागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए यह सनातन नौका के समान है । अलकापुरी के राजाधिराज कुबेर सदा भगवान शिव की भक्ति में तत्पर रहनेवाले हैं । उनका ‘हेममाली’ नामक एक यक्ष सेवक था, जो पूजा के लिए फूल लाया करता था । हेममाली की पत्नी का नाम ‘विशालाक्षी’ था । वह यक्ष कामपाश में आबद्ध होकर सदा अपनी पत्नी में आसक्त रहता था । एक दिन हेममाली मानसरोवर से फूल लाकर अपने घर में ही ठहर गया और पत्नी के प्रेमपाश में खोया रह गया, अत: कुबेर के भवन में न जा सका । इधर कुबेर मन्दिर में बैठकर शिव का पूजन कर रहे थे । उन्होंने दोपहर तक फूल आने की प्रतीक्षा की । जब पूजा का समय व्यतीत हो गया तो यक्षराज ने कुपित होकर सेवकों से कहा : ‘यक्षों ! दुरात्मा हेममाली क्यों नहीं आ रहा है ?’ यक्षों ने कहा: राजन् ! वह तो पत्नी की कामना में आसक्त हो घर में ही रमण कर रहा है । यह सुनकर कुबेर क्रोध से भर गये और तुरन्त ही हेममाली को बुलवाया । वह आकर कुबेर के सामने खड़ा हो गया । उसे देखकर कुबेर बोले : ‘ओ पापी ! अरे दुष्ट ! ओ दुराचारी ! तूने भगवान की अवहेलना की है, अत: कोढ़ से युक्त और अपनी उस प्रियतमा से वियुक्त होकर इस स्थान से भ्रष्ट होकर अन्यत्र चला जा ।’ कुबेर के ऐसा कहने पर वह उस स्थान से नीचे गिर गया । कोढ़ से सारा शरीर पीड़ित था परन्तु शिव पूजा के प्रभाव से उसकी स्मरणशक्ति लुप्त नहीं हुई । तदनन्तर वह पर्वतों में श्रेष्ठ मेरुगिरि के शिखर पर गया । वहाँ पर मुनिवर मार्कण्डेयजी का उसे दर्शन हुआ । पापकर्मा यक्ष ने मुनि के चरणों में प्रणाम किया । मुनिवर मार्कण्डेय ने उसे भय से काँपते देख कहा : ‘तुझे कोढ़ के रोग ने कैसे दबा लिया ?’ यक्ष बोला : मुने ! मैं कुबेर का अनुचर हेममाली हूँ । मैं प्रतिदिन मानसरोवर से फूल लाकर शिव पूजा के समय कुबेर को दिया करता था । एक दिन पत्नी सहवास के सुख में फँस जाने के कारण मुझे समय का ज्ञान ही नहीं रहा, अत: राजाधिराज कुबेर ने कुपित होकर मुझे शाप दे दिया, जिससे मैं कोढ़ से आक्रान्त होकर अपनी प्रियतमा से बिछुड़ गया । मुनिश्रेष्ठ ! संतों का चित्त स्वभावत: परोपकार में लगा रहता है, यह जानकर मुझ अपराधी को कर्त्तव्य का उपदेश दीजिये । मार्कण्डेयजी ने कहा: तुमने यहाँ सच्ची बात कही है, इसलिए मैं तुम्हें कल्याणप्रद व्रत का उपदेश करता हूँ । तुम आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत करो । इस व्रत के पुण्य से तुम्हारा कोढ़ निश्चय ही दूर हो जायेगा । भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: राजन् ! मार्कण्डेयजी के उपदेश से उसने ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत किया, जिससे उसके शरीर को कोढ़ दूर हो गया । उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान करने पर वह पूर्ण सुखी हो गया । नृपश्रेष्ठ ! यह ‘योगिनी’ का व्रत ऐसा पुण्यशाली है कि अठ्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल मिलता है, वही फल ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत करनेवाले मनुष्य को मिलता है । ‘योगिनी’ महान पापों को शान्त करनेवाली और महान पुण्य फल देनेवाली है । इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है । जय जय श्री राम कृष्ण हरि विठ्ठल केशव 🌷🙏⚜️

🌿पारद शिवलिंग का अद्भुत महत्व🌿 पारद (पारा/रसराज) शिवलिंग को शैव और तांत्रिक परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। आयुर्वेद और रसशास्त्र में पारद को "रसराज" कहा गया है। मान्यता है कि विधिपूर्वक संस्कारित (शोधित एवं बंधित) पारद से निर्मित शिवलिंग भगवान शिव के साक्षात् तेज का प्रतीक माना जाता है। पुराणों और शैव परंपरा के अनुसार भगवान शिव ने माता पार्वती को पारद के दिव्य रहस्य बताए। आगे चलकर ऋषियों और रससिद्ध आचार्यों ने इन रहस्यों के आधार पर संस्कारित पारद शिवलिंग बनाने की परंपरा विकसित की। अनेक ग्रंथों में पारद शिवलिंग की महिमा का वर्णन मिलता है, जबकि इसके निर्माण की विस्तृत विधि रसशास्त्र के ग्रंथों में वर्णित है। यह ध्यान देने योग्य है कि किसी प्रमुख पुराण में किसी एक मानव द्वारा प्रथम पारद शिवलिंग बनाए जाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। मान्यता है कि जिस स्थान पर विधिवत प्रतिष्ठित पारद शिवलिंग की नित्य पूजा होती है, वहाँ शिव, माता पार्वती तथा समस्त देवताओं की कृपा बनी रहती है। श्रद्धापूर्वक अभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण, रुद्राक्ष, धूप, दीप और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करने से मन की शांति, आध्यात्मिक उन्नति, साहस, सकारात्मक ऊर्जा और शिवकृपा की प्राप्ति होती है। अनेक साधक इसे ध्यान, जप और तांत्रिक साधना के लिए भी अत्यंत शुभ मानते हैं। पारद शिवलिंग अष्टकम् नमामि पारदं देवं, शिवरूपं सनातनम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं नित्यं, भक्तानां हितकारकम्॥ रसराजस्वरूपं त्वं, दिव्यतेजोमयं विभो। पापनाशकरं नित्यं, सर्वमङ्गलकारकम्॥ बिल्वपत्रप्रियं शम्भो, गङ्गाधर त्रिलोचन। भक्तवत्सल देवेश, त्राहि मां करुणानिधे॥ रुद्ररूप महादेव, नीलकण्ठ कृपानिधे। सर्वदुःखहरं शान्तं, वन्दे पारदलिङ्गकम्॥ अभिषेकप्रियं देवं, चन्द्रशेखर शङ्करम्। भस्माङ्गरागसंयुक्तं, विश्वनाथं नमाम्यहम्॥ योगिनां हृदये नित्यं, ज्ञानदीपप्रकाशकम्। आत्मबोधप्रदं शान्तं, शिवलिङ्गं नमाम्यहम्॥ सर्वरोगहरं देवं, सर्वसिद्धिप्रदायकम्। भक्तकामप्रदं नित्यं, वन्दे पारदमिश्वरम्॥ यः पठेद्भक्तिभावेन, पारदाष्टकमुत्तमम्। तस्य शिवप्रसादेन, सर्वमङ्गलमाप्नुयात्॥ * हर हर महादेव।

🌿पारद शिवलिंग का अद्भुत महत्व🌿 पारद (पारा/रसराज) शिवलिंग को शैव और तांत्रिक परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। आयुर्वेद और रसशास्त्र में पारद को "रसराज" कहा गया है। मान्यता है कि विधिपूर्वक संस्कारित (शोधित एवं बंधित) पारद से निर्मित शिवलिंग भगवान शिव के साक्षात् तेज का प्रतीक माना जाता है। पुराणों और शैव परंपरा के अनुसार भगवान शिव ने माता पार्वती को पारद के दिव्य रहस्य बताए। आगे चलकर ऋषियों और रससिद्ध आचार्यों ने इन रहस्यों के आधार पर संस्कारित पारद शिवलिंग बनाने की परंपरा विकसित की। अनेक ग्रंथों में पारद शिवलिंग की महिमा का वर्णन मिलता है, जबकि इसके निर्माण की विस्तृत विधि रसशास्त्र के ग्रंथों में वर्णित है। यह ध्यान देने योग्य है कि किसी प्रमुख पुराण में किसी एक मानव द्वारा प्रथम पारद शिवलिंग बनाए जाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। मान्यता है कि जिस स्थान पर विधिवत प्रतिष्ठित पारद शिवलिंग की नित्य पूजा होती है, वहाँ शिव, माता पार्वती तथा समस्त देवताओं की कृपा बनी रहती है। श्रद्धापूर्वक अभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण, रुद्राक्ष, धूप, दीप और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करने से मन की शांति, आध्यात्मिक उन्नति, साहस, सकारात्मक ऊर्जा और शिवकृपा की प्राप्ति होती है। अनेक साधक इसे ध्यान, जप और तांत्रिक साधना के लिए भी अत्यंत शुभ मानते हैं। पारद शिवलिंग अष्टकम् नमामि पारदं देवं, शिवरूपं सनातनम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं नित्यं, भक्तानां हितकारकम्॥ रसराजस्वरूपं त्वं, दिव्यतेजोमयं विभो। पापनाशकरं नित्यं, सर्वमङ्गलकारकम्॥ बिल्वपत्रप्रियं शम्भो, गङ्गाधर त्रिलोचन। भक्तवत्सल देवेश, त्राहि मां करुणानिधे॥ रुद्ररूप महादेव, नीलकण्ठ कृपानिधे। सर्वदुःखहरं शान्तं, वन्दे पारदलिङ्गकम्॥ अभिषेकप्रियं देवं, चन्द्रशेखर शङ्करम्। भस्माङ्गरागसंयुक्तं, विश्वनाथं नमाम्यहम्॥ योगिनां हृदये नित्यं, ज्ञानदीपप्रकाशकम्। आत्मबोधप्रदं शान्तं, शिवलिङ्गं नमाम्यहम्॥ सर्वरोगहरं देवं, सर्वसिद्धिप्रदायकम्। भक्तकामप्रदं नित्यं, वन्दे पारदमिश्वरम्॥ यः पठेद्भक्तिभावेन, पारदाष्टकमुत्तमम्। तस्य शिवप्रसादेन, सर्वमङ्गलमाप्नुयात्॥ * हर हर महादेव।