Friday, July 10, 2026

भगवत्प्रेम दृढ़ भाव के लिए महाप्रभु ने पाँच उपाय बतलाये हैं- (१) निरन्तर नाम-जप (2) विशिष्ट सत्संग (3) श्रीमद्भागवत का आस्वाद (4) श्रीविग्रह सेवा (5) श्रीव्रज वास श्री रूप गोस्वामी ने लिखा है कि ये पाँचों इतनी विलक्षण शक्ति सम्पन्न साधनाएँ हैं कि कल्पनातीत शीघ्रता से भाव, जो प्रेम की पूर्व की अवस्था है और जिसका एक नाम ‘रति’ भी है, उत्पन्न हो जाता है। पर *‘सद्धियाम्’* इसकी टीका की गयी है- *‘अपराधविहीनानाम्’*। अर्थात् जो भगवद्सेवापराध एवं नामापराध से रहित हैं, उनमें इस साधना से एक क्षण में ही भाव उत्पन्न हो जाता है, अपराधयुक्त प्राणी में नहीं। जैसे लकड़ी के दो टुकड़े हैं। उन दोनों में अग्नि तो व्याप्त है। न विश्वास हो तो रगड़कर देख लें, उसमें से आग निकलेगी। इसी प्रकार भगवान् प्रत्येक प्राणी में बाहर-भीतर, नीचे-ऊपर व्याप्त हैं। अब जैसे आग कहीं प्रकट हो जाय और प्रकट होकर किसी लकड़ी के खण्ड को पकड़ ले तो फिर लकड़ी उसी आग में जलकर स्वयं आग बन जाती है। जहाँ अग्नि का संयोग हुआ कि वह लकड़ी फिर लकड़ी रह ही नहीं सकती। वह निश्चय-निश्चय आग बन जाती है। ठीक इसी प्रकार, जिस समय भगवान् का वास्तविक साक्षात्कार संत को होता है, उसी क्षण वह भगवान् में मिल जाता है। ठीक भगवान् के रूप का बनकर ही तब भगवान् का अनुभव करता है। वस्तुतः जो वह स्थिति इतनी विलक्षण- इतनी अद्भुत है कि उसे किसी भी दृष्टान्त से समझाया जा नहीं सकता क्योंकि सभी दृष्टान्त जड़-जगत् के हैं और संत एवं भगवान् के मिलन की बात चिन्मय जगत् की है। पर यदि इस दृष्टान्त को कोई ध्यान में रखे तो वह कुछ-कुछ कल्पना कर सकता है। भगवान् हैं तो प्रत्येक प्राणी में, पर कहाँ पर किस कारण से (प्रेम की रगड़ से) प्रकट हुए और प्रकट होते ही उन्होंने अपने आधार को अर्थात् जिसके लिये जिसमें प्रकट हुए थे उसे बिलकुल पूरा-पूरा अपने समान बना लिया। जलने के बाद जिस तरह काठ बिलकुल काठ न रहकर अग्नि हो जाता है, ठीक वैसे ही संत देखने में तो मामूली मनुष्य की तरह खाता-पीता, व्यवहार करता है, हँसता-रोता है, संन्यासी न हो तो घर-गृहस्थी भी करता है, परंतु वस्तुतः वह भगवान् की ही एक लीला है। जिससे वे अपने को छिपाये रहते हैं। प्रश्न यह होता है कि फिर उस शरीर को भगवान् रखते क्यों हैं? रखते हैं इसीलिये कि उसके स्पर्श में आकर कुछ और भी प्राणी उस आग में जलकर उसी की तरह बन जायँ, इसीलिये प्रारब्ध की लीला का निर्वाह होता है। श्री राधाबाबा जी

ईश्वर

युधिष्ठिर ने पूछा : वासुदेव ! आषाढ़ के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है? कृपया उसका वर्णन कीजिये । भगवान श्रीकृष्ण बोले : नृपश्रेष्ठ ! आषाढ़ (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार ज्येष्ठ ) के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘योगिनी’ है। यह बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है। संसारसागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए यह सनातन नौका के समान है । अलकापुरी के राजाधिराज कुबेर सदा भगवान शिव की भक्ति में तत्पर रहनेवाले हैं । उनका ‘हेममाली’ नामक एक यक्ष सेवक था, जो पूजा के लिए फूल लाया करता था । हेममाली की पत्नी का नाम ‘विशालाक्षी’ था । वह यक्ष कामपाश में आबद्ध होकर सदा अपनी पत्नी में आसक्त रहता था । एक दिन हेममाली मानसरोवर से फूल लाकर अपने घर में ही ठहर गया और पत्नी के प्रेमपाश में खोया रह गया, अत: कुबेर के भवन में न जा सका । इधर कुबेर मन्दिर में बैठकर शिव का पूजन कर रहे थे । उन्होंने दोपहर तक फूल आने की प्रतीक्षा की । जब पूजा का समय व्यतीत हो गया तो यक्षराज ने कुपित होकर सेवकों से कहा : ‘यक्षों ! दुरात्मा हेममाली क्यों नहीं आ रहा है ?’ यक्षों ने कहा: राजन् ! वह तो पत्नी की कामना में आसक्त हो घर में ही रमण कर रहा है । यह सुनकर कुबेर क्रोध से भर गये और तुरन्त ही हेममाली को बुलवाया । वह आकर कुबेर के सामने खड़ा हो गया । उसे देखकर कुबेर बोले : ‘ओ पापी ! अरे दुष्ट ! ओ दुराचारी ! तूने भगवान की अवहेलना की है, अत: कोढ़ से युक्त और अपनी उस प्रियतमा से वियुक्त होकर इस स्थान से भ्रष्ट होकर अन्यत्र चला जा ।’ कुबेर के ऐसा कहने पर वह उस स्थान से नीचे गिर गया । कोढ़ से सारा शरीर पीड़ित था परन्तु शिव पूजा के प्रभाव से उसकी स्मरणशक्ति लुप्त नहीं हुई । तदनन्तर वह पर्वतों में श्रेष्ठ मेरुगिरि के शिखर पर गया । वहाँ पर मुनिवर मार्कण्डेयजी का उसे दर्शन हुआ । पापकर्मा यक्ष ने मुनि के चरणों में प्रणाम किया । मुनिवर मार्कण्डेय ने उसे भय से काँपते देख कहा : ‘तुझे कोढ़ के रोग ने कैसे दबा लिया ?’ यक्ष बोला : मुने ! मैं कुबेर का अनुचर हेममाली हूँ । मैं प्रतिदिन मानसरोवर से फूल लाकर शिव पूजा के समय कुबेर को दिया करता था । एक दिन पत्नी सहवास के सुख में फँस जाने के कारण मुझे समय का ज्ञान ही नहीं रहा, अत: राजाधिराज कुबेर ने कुपित होकर मुझे शाप दे दिया, जिससे मैं कोढ़ से आक्रान्त होकर अपनी प्रियतमा से बिछुड़ गया । मुनिश्रेष्ठ ! संतों का चित्त स्वभावत: परोपकार में लगा रहता है, यह जानकर मुझ अपराधी को कर्त्तव्य का उपदेश दीजिये । मार्कण्डेयजी ने कहा: तुमने यहाँ सच्ची बात कही है, इसलिए मैं तुम्हें कल्याणप्रद व्रत का उपदेश करता हूँ । तुम आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत करो । इस व्रत के पुण्य से तुम्हारा कोढ़ निश्चय ही दूर हो जायेगा । भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: राजन् ! मार्कण्डेयजी के उपदेश से उसने ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत किया, जिससे उसके शरीर को कोढ़ दूर हो गया । उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान करने पर वह पूर्ण सुखी हो गया । नृपश्रेष्ठ ! यह ‘योगिनी’ का व्रत ऐसा पुण्यशाली है कि अठ्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल मिलता है, वही फल ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत करनेवाले मनुष्य को मिलता है । ‘योगिनी’ महान पापों को शान्त करनेवाली और महान पुण्य फल देनेवाली है । इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है । जय जय श्री राम कृष्ण हरि विठ्ठल केशव 🌷🙏⚜️

🌿पारद शिवलिंग का अद्भुत महत्व🌿 पारद (पारा/रसराज) शिवलिंग को शैव और तांत्रिक परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। आयुर्वेद और रसशास्त्र में पारद को "रसराज" कहा गया है। मान्यता है कि विधिपूर्वक संस्कारित (शोधित एवं बंधित) पारद से निर्मित शिवलिंग भगवान शिव के साक्षात् तेज का प्रतीक माना जाता है। पुराणों और शैव परंपरा के अनुसार भगवान शिव ने माता पार्वती को पारद के दिव्य रहस्य बताए। आगे चलकर ऋषियों और रससिद्ध आचार्यों ने इन रहस्यों के आधार पर संस्कारित पारद शिवलिंग बनाने की परंपरा विकसित की। अनेक ग्रंथों में पारद शिवलिंग की महिमा का वर्णन मिलता है, जबकि इसके निर्माण की विस्तृत विधि रसशास्त्र के ग्रंथों में वर्णित है। यह ध्यान देने योग्य है कि किसी प्रमुख पुराण में किसी एक मानव द्वारा प्रथम पारद शिवलिंग बनाए जाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। मान्यता है कि जिस स्थान पर विधिवत प्रतिष्ठित पारद शिवलिंग की नित्य पूजा होती है, वहाँ शिव, माता पार्वती तथा समस्त देवताओं की कृपा बनी रहती है। श्रद्धापूर्वक अभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण, रुद्राक्ष, धूप, दीप और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करने से मन की शांति, आध्यात्मिक उन्नति, साहस, सकारात्मक ऊर्जा और शिवकृपा की प्राप्ति होती है। अनेक साधक इसे ध्यान, जप और तांत्रिक साधना के लिए भी अत्यंत शुभ मानते हैं। पारद शिवलिंग अष्टकम् नमामि पारदं देवं, शिवरूपं सनातनम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं नित्यं, भक्तानां हितकारकम्॥ रसराजस्वरूपं त्वं, दिव्यतेजोमयं विभो। पापनाशकरं नित्यं, सर्वमङ्गलकारकम्॥ बिल्वपत्रप्रियं शम्भो, गङ्गाधर त्रिलोचन। भक्तवत्सल देवेश, त्राहि मां करुणानिधे॥ रुद्ररूप महादेव, नीलकण्ठ कृपानिधे। सर्वदुःखहरं शान्तं, वन्दे पारदलिङ्गकम्॥ अभिषेकप्रियं देवं, चन्द्रशेखर शङ्करम्। भस्माङ्गरागसंयुक्तं, विश्वनाथं नमाम्यहम्॥ योगिनां हृदये नित्यं, ज्ञानदीपप्रकाशकम्। आत्मबोधप्रदं शान्तं, शिवलिङ्गं नमाम्यहम्॥ सर्वरोगहरं देवं, सर्वसिद्धिप्रदायकम्। भक्तकामप्रदं नित्यं, वन्दे पारदमिश्वरम्॥ यः पठेद्भक्तिभावेन, पारदाष्टकमुत्तमम्। तस्य शिवप्रसादेन, सर्वमङ्गलमाप्नुयात्॥ * हर हर महादेव।

🌿पारद शिवलिंग का अद्भुत महत्व🌿 पारद (पारा/रसराज) शिवलिंग को शैव और तांत्रिक परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। आयुर्वेद और रसशास्त्र में पारद को "रसराज" कहा गया है। मान्यता है कि विधिपूर्वक संस्कारित (शोधित एवं बंधित) पारद से निर्मित शिवलिंग भगवान शिव के साक्षात् तेज का प्रतीक माना जाता है। पुराणों और शैव परंपरा के अनुसार भगवान शिव ने माता पार्वती को पारद के दिव्य रहस्य बताए। आगे चलकर ऋषियों और रससिद्ध आचार्यों ने इन रहस्यों के आधार पर संस्कारित पारद शिवलिंग बनाने की परंपरा विकसित की। अनेक ग्रंथों में पारद शिवलिंग की महिमा का वर्णन मिलता है, जबकि इसके निर्माण की विस्तृत विधि रसशास्त्र के ग्रंथों में वर्णित है। यह ध्यान देने योग्य है कि किसी प्रमुख पुराण में किसी एक मानव द्वारा प्रथम पारद शिवलिंग बनाए जाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। मान्यता है कि जिस स्थान पर विधिवत प्रतिष्ठित पारद शिवलिंग की नित्य पूजा होती है, वहाँ शिव, माता पार्वती तथा समस्त देवताओं की कृपा बनी रहती है। श्रद्धापूर्वक अभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण, रुद्राक्ष, धूप, दीप और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करने से मन की शांति, आध्यात्मिक उन्नति, साहस, सकारात्मक ऊर्जा और शिवकृपा की प्राप्ति होती है। अनेक साधक इसे ध्यान, जप और तांत्रिक साधना के लिए भी अत्यंत शुभ मानते हैं। पारद शिवलिंग अष्टकम् नमामि पारदं देवं, शिवरूपं सनातनम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं नित्यं, भक्तानां हितकारकम्॥ रसराजस्वरूपं त्वं, दिव्यतेजोमयं विभो। पापनाशकरं नित्यं, सर्वमङ्गलकारकम्॥ बिल्वपत्रप्रियं शम्भो, गङ्गाधर त्रिलोचन। भक्तवत्सल देवेश, त्राहि मां करुणानिधे॥ रुद्ररूप महादेव, नीलकण्ठ कृपानिधे। सर्वदुःखहरं शान्तं, वन्दे पारदलिङ्गकम्॥ अभिषेकप्रियं देवं, चन्द्रशेखर शङ्करम्। भस्माङ्गरागसंयुक्तं, विश्वनाथं नमाम्यहम्॥ योगिनां हृदये नित्यं, ज्ञानदीपप्रकाशकम्। आत्मबोधप्रदं शान्तं, शिवलिङ्गं नमाम्यहम्॥ सर्वरोगहरं देवं, सर्वसिद्धिप्रदायकम्। भक्तकामप्रदं नित्यं, वन्दे पारदमिश्वरम्॥ यः पठेद्भक्तिभावेन, पारदाष्टकमुत्तमम्। तस्य शिवप्रसादेन, सर्वमङ्गलमाप्नुयात्॥ * हर हर महादेव।