Tuesday, August 5, 2025
श्रावण मास माहात्म्य
”
अध्याय–25
इस अध्याय में पढ़िये–श्रावण अमावस्या को किए जाने वाले पिठोरी व्रत का वर्णन
ईश्वर बोले–‘हे मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं उत्तम पिठोरी व्रत का वर्णन करूँगा। सभी सम्पदाओं को प्रदान करने वाला यह व्रत श्रावण मास की अमावस्या को होता है।
जो यह घर है वह सभी वस्तु मात्र का अधिष्ठान है इसलिए इसे पीठ कहा गया है और पूजन में वस्तु मात्र के समूह को ‘आर’ कहते हैं, अतः हे मुनीश्वर ! इस व्रत का नाम इसलिए ‘पिठोर’ है। अब मैं उसकी विधि कहूँगा, सावधान होकर सुनिए।
दीवार को ताम्रवर्ण, कृष्णवर्ण अथवा श्वेतवर्ण धातु से पोतना चाहिए। अगर ताम्रवर्ण से पोता गया हो तो पीले रंग से, कृष्ण वर्ण से पोता गया तो श्वेत रंग से और श्वेत वर्ण से पोता गया हो तो कृष्ण वर्ण से चित्र बनाना चाहिए। अथवा श्वेत पीत से, लाल से, काले या हरे वर्ण से चित्र बनाएँ।
मध्य में पार्वती सहित शिव की मूर्त्ति अथवा शिवलिंग को बनाकर विस्तीर्ण दीवार पर संसार की अनेक चीजों का चित्र बनाएँ।
चतुःशाला सहित रसोईघर, देवालय, शयनघर, सात खजाने, स्त्रियों का अंतःपुर जो महलों तथा अट्टालिकाओं से सुशोभित तथा शाल के वृक्षों से मण्डित हो, चूने आदि से दृढ़ता से बंधे पाषाणों तथा ईंटों से सुशोभित हो और जिसमें विचित्र दरवाजे-छत तथा क्रीड़ास्थान हों, इन सभी को चित्रित करें।
बकरियां, गायें, भैंस, घोड़े, ऊँट, हाथी, चलने वाला रथ, अनेक प्रकार की सवारी गाड़ियाँ, स्त्रियाँ, बच्चे, वृद्ध, जवान, पुरुष, पालकी, झूला और अनेक प्रकार के मंच–इन सबका अंकन करें। सुवर्ण, चाँदी, ताम्र, सीसा, लोहा, मिटटी तथा पीतल के और अन्य प्रकार के विभिन्न रंगों वाले पात्रों को लिखें।
शयन सम्बन्धी जितने भी साधन हैं–चारपाई, पलंग, बिस्तर, तकिया आदि, बिल्ली, मैना अन्य और भी शुभ पक्षी, पुरुषों तथा स्त्रियों के अनेक प्रकार के आभूषण, बिछाने तथा ओढ़ने के जो वस्त्र हैं, यज्ञ के जितने भी पात्र होते है, मंथन के लिए दो स्तम्भ व तीन रस्सियाँ, दूध, मक्खन, दही, तकर, छाछ, घी, तेल, तिल–इन सभी को दीवार पर लिखें।
गेहूँ, चावल, अरहर, जौ, मक्का, वार्तानल (एक प्रकार का अन्न होता है), चना, मसूर, कुलथी, मूंग, कांगनी, तिल, कोदों, कातसी नामक अन्न, साँवाँ, चावल, उड़द–ये सभी धान्यवर्ग भी अंकित करें।
सील, लोढ़ा, चूल्हा, झाड़ू, पुरुषों व स्त्रियों के सभी वस्त्र, बाँस तथा तृण के बने हुए सूप आदि, ओखली, मूसल, (गेहूं आदि पीसने तथा अरहर आदि दलने के लिए) दो यन्त्र–चाकी तथा दरैता, पंखा, चंवर, छत्र, जूता, दो खड़ाऊं, दासी, दास, नौकर, पोष्यवर्ग, तृण आदि पशुओं का आहार, धनुष, बाण, शतघ्नी (एक प्रकार का अस्त्र), खडग, भाला, बरछी, ढाल, पाश, अंकुश, गदा, त्रिशूल, भिन्दिपाल, तोमर, मुद्गर, फरसा, पट्टिश, भुशुण्डि, परिघ, चक्रयन्त्र आदि, जलयन्त्र, दवात, लेखनी, पुस्तक, सभी प्रकार के फल, छुरी, कैंची, अनेक प्रकार के पुष्प, विल्वपत्र, तुलसीदल, मशाल-दीपक तथा दीवट आदि उनके साधन, अनेक विध खाने योग्य शाक तथा पकवानों के जितने भी प्रकार हैं–उन सभी को लिखना है।
जो वस्तुएँ यहाँ नहीं बताई गई है उस सबको भी दीवार पर लिखना है क्योंकि यहाँ पर सभी कुछ लिखना सम्भव नहीं है क्योंकि एक-एक पदार्थ के सैकड़ो तथा हजारों भेद हैं और मैं कितना कह सका हूँ।
सोलहों उपचारों से इन सभी का पूजन होना चाहिए। पूजन में अनेक प्रकार के गन्ध-द्रव्य, पुष्प, धूप तथा चन्दन अर्पित करें। ब्राह्मणों, बालकों तथा सौभाग्यवती स्त्रियों को भोजन कराएं।
उसके बाद पार्वती सहित शिव से प्रार्थना करें–‘मेरा व्रत सम्पूर्ण हो। हे साम्ब शिव ! हे दयासागर ! हे गिरीश ! हे चंद्रशेखर ! इस व्रत से प्रसन्न होकर आप हमारे मनोरथ पूर्ण करें।’
इस प्रकार पाँच वर्ष तक व्रत करके बाद में उद्यापन कर देना चाहिए। इसमें घृत तथा बिल्वपत्रों से शिव-मन्त्र के द्वारा होम होता है। एक दिन अधिवासन करके सर्वप्रथम ग्रह होम करना चाहिए। आहुति की संख्या एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ होनी चाहिए।
हे वत्स ! उसके बाद आचार्य की पूजा करें और भूयसी दक्षिणा दें। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। इसके बाद व्यक्ति इष्ट बन्धुजनों तथा कुटुम्ब के साथ स्वयं भोजन करे। ऐसा विधान किए जाने पर मनुष्य सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। इस लोक में जो-जो वस्तुएं उसे परम अभीष्ट होती है, उन सभी को वह पा लेता है।
हे वत्स ! मैंने आपसे इस उत्तम पिठोरी व्रत का वर्णन कर दिया। इस व्रत के समान सभी मनोरथों तथा समृद्धियों को प्रदान करने वाला और शिवजी की प्रसन्नता करने वाला न कोई व्रत हुआ है और न तो होगा। मनुष्य इस व्रत में दीवार पर जो-जो वस्तु बनाता है उसको निश्चित रूप से पा लेता है।
॥इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में ‘अमावस्या में पिठोरी व्रत कथन’ नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॐ नमःशिवाय”
"श्रावण मास माहात्म्य"
इस अध्याय में पढ़िये–श्रावण मास में किए जाने वाले संकष्ट हरण व्रत का विधान
ईश्वर बोले–‘हे मुनिश्रेष्ठ ! श्रावण मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन सभी वांछित फल प्रदान करने वाला संकष्टहरण नामक व्रत करना चाहिए।’
सनत्कुमार बोले–‘किस विधि से यह व्रत किया जाता है, इस व्रत में क्या करना चाहिए, किस देवता का पूजन करना चाहिए और इसका उद्यापन कब करना चाहिए ? उसके विषय में मुझे विस्तार पूर्वक बताइए।’
ईश्वर बोले–‘चतुर्थी के दिन प्रातः उठकर दंतधावन करके इस संकष्टहरण नामक शुभ व्रत को करने के लिए यह संकल्प ग्रहण करना चाहिए–‘हे देवेश ! आज मैं चन्द्रमा के उदय होने तक निराहार रहूँगा और रात्रि में आपकी पूजा करके भोजन करूँगा, संकट से मेरा उद्धार कीजिए।’
हे ब्रह्मपुत्र ! इस प्रकार संकल्प करके शुभ काले तिलों से युक्त जल से स्नान करके समस्त आह्निक कृत्य सम्पन्न करने के बाद गणपति की पूजा करनी चाहिए।
बुद्धिमान को चाहिए की तीन माशे अथवा उसके आधे परिमाण अथवा एक माशे सुवर्ण से अथवा अपनी शक्ति के अनुसार सुवर्ण की प्रतिमा बनाए। सुवर्ण के अभाव में चांदी अथवा तांबे की ही प्रतिमा सुखपूर्वक बनाए।
यदि निर्धन हो तो वह मिट्टी की ही शुभ प्रतिमा बना ले किन्तु इसमें वित्त शाठ्य ना करें क्योंकि ऐसा करने पर कार्य नष्ट हो जाता है। रम्य अष्टदल कमल पर जल से पूर्ण तथा वस्त्रयुक्त कलश स्थापित करें और उसके ऊपर पूर्णपात्र रखकर उसमें वैदिक तथा तांत्रिक मन्त्रों द्वारा सोलहों उपचारों से देवता की पूजा करें।
हे विप्र ! तिलयुक्त दस उत्तम मोदक बनाएं, उनमें से पाँच मोदक देवता को अर्पित करें और पाँच मोदक ब्राह्मण को प्रदान करें।
भक्ति भाव से उस विप्र की देवता की भाँति पूजा करें और यथाशक्ति दक्षिणा देकर यह प्रार्थना करे–‘हे विप्रवरी ! आपको नमस्कार है। हे देव ! मैं आपको फल तथा दक्षिणा से युक्त पाँच मोदक प्रदान करता हूँ। हे द्विजश्रेष्ठ ! मेरी विपत्ति को दूर करने के लिए इसे ग्रहण कीजिए। हे विप्ररूप गणेश्वर ! मेरे द्वारा जो भी न्यून, अधिक अथवा द्रव्यहीन कृत्य किया गया हो, वह सब पूर्णता को प्राप्त हो।’ इसके बाद स्वादिष्ट अन्न से ब्राह्मणों को प्रसन्नतापूर्वक भोजन कराएं।
उसके बाद चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करे, उसका मन्त्र प्रारम्भ से सुनिए–‘हे क्षीरसागर से प्रादुर्भूत ! हे सुधारूप ! हे निशाकर ! हे गणेश की प्रीति को बढ़ाने वाले ! मेरे द्वारा दिए गए अर्घ्य को ग्रहण कीजिए।’
इस विधान के करने पर गणेश्वर प्रसन्न होते हैं और वांछित फल प्रदान करते हैं, अतः इस व्रत को अवश्य करना चाहिए।
इस व्रत का अनुष्ठान करने से विद्यार्थी विद्या प्राप्त करता है, धन चाहने वाला धन पा जाता है, पुत्र की अभिलाषा रखने वाला पुत्र प्राप्त करता है, मोक्ष चाहने वाला उत्तम गति प्राप्त करता है, कार्य की सिद्धि चाहने वाले का कार्य सिद्ध हो जाता है और रोगी रोग से मुक्त हो जाता है।
विपत्तियों में पड़े हुए, व्याकुल चित्तवाले, चिंता से ग्रस्त मनवाले तथा जिन्हे अपने सुहृज्जनों का वियोग हो गया हो–उन मनुष्यों का दुःख दूर हो जाता है। यह व्रत मनुष्यों के सभी कष्टों का निवारण करने वाला, उन्हें सभी अभीष्ट फल प्रदान करने वाला, पुत्र-पौत्र आदि देने वाला तथा सभी प्रकार की संपत्ति प्रदान कराने वाला है।
हे सनत्कुमार ! अब मैं पूजन तथा जप के मंत्रो को आपसे कहता हूँ–‘प्रणव’ के पश्चात ‘नमः’ शब्द लगाकर बाद में ‘हेरम्ब’, ‘मदमोदित’ तथा ‘सङ्कष्टस्य निवारण’–इन शब्दों का चतुर्थ्यन्त जोड़कर पुनः अंत में ‘स्वाहा’ प्रयुक्त करके इस इक्कीस वर्ण वाले मन्त्र–‘ॐ नमो हेरम्बाय मदमोदिताय संकष्टस्य निवारणाय स्वाहा’–को बोलना चाहिए।
बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि इन्द्र आदि लोकपालों की सभी दिशाओं में पूजा करें। अब मैं मोदकों की दूसरी विधि आपको बताता हूँ–के हुए मूँग तथा तिलों से युक्त घी में पकाए गए तथा गरी के छोटे-छोटे टुकड़ों से मिश्रित मोदक गणेश जी को अर्पित करें। उसके बाद दूर्वा के अंकुर लेकर इन नाम पदों से पृथक-पृथक गणेश जी की पूजा करें।
उन नामों को मुझसे सुनिए–‘हे गणाधिप ! हे उमापुत्र ! हे अघनाशन ! हे एकदन्त ! हे इभवक्त्र ! हे मूषकवाहन ! हे विनायक ! हे ईशपुत्र ! हे सर्वसिद्धिप्रदायक ! हे विघ्नराज ! हे स्कन्द्गुरो ! हे सर्वसंकष्टनाशन ! हे लम्बोदर ! हे गणाध्यक्ष ! हे गौर्यांगमलसम्भव ! हे धूमकेतो ! हे भालचंद्र ! हे सिन्दूरासुरमर्दन ! हे विद्यानिधान ! हे विकत ! हे शूर्पकर्ण ! आपको नमस्कार है।’ इस प्रकार इन इक्कीस नामों से गणेश जी की पूजा करें।
उसके बाद भक्ति से नम्र होकर प्रसन्नबुद्धि से गणेश देवता से इस प्रकार प्रार्थना करें–‘हे विघ्नराज ! आपको नमस्कार है। हे उमापुत्र ! हे अघनाशन ! जिस उद्देश्य से मैंने यथाशक्ति आज आपका पूजन किया है, उससे प्रसन्न होकर शीघ्र ही मेरे हृदयस्थित मनोरथों को पूर्ण कीजिए।
हे प्रभो ! मेरे समक्ष उपस्थित विविध प्रकार के समस्त विघ्नों का नाश कीजिए, मैं यहां सभी कार्य आपकी ही कृपा से करता हूँ, मेरे शत्रुओं की बुद्धि का नाश कीजिए तथा मित्रों की उन्नति कीजिए।’
इसके बाद एक सौ आठ आहुति देकर होम करें। उसके बाद व्रत की संपूर्णता के लिए मोदकों का वायन प्रदान करें। उस समय यह कहें–‘गणेश जी की प्रसन्नता के लिए मैं सात लड्डुओं तथा सात मोदकों का वायन फल सहित ब्राह्मण को प्रदान करता हूँ।’
तदनन्तर हे सत्तम ! पुण्यदायिनी कथा सुनकर इस मन्त्र के द्वारा पाँच बार प्रयत्नपूर्वक चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करें–
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिगोत्रसमुद्भव।
गृहाणारघ्यं मया दत्तं रोहिण्या सहितः शशिन॥
क्षीरसागर से उत्पन्न तथा अत्रिगोत्र में उत्पन्न हे चंद्र ! रोहिणी सहित आप मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्य को स्वीकार कीजिए।
उसके बाद अपने अपराध के लिए देवता से क्षमा प्रार्थना करें और अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा ब्राह्मणों को जो अर्पित किया हो उसके अवशिष्ट भोजन को स्वयं ग्रहण करें। मौन होकर सात ग्रास ग्रहण करें और अशक्त हो तो इच्छानुसार भोजन करें।
इसी प्रकार तीन मास अथवा चार मास तक विधानपूर्वक इस व्रत को करें। उसके बाद बुद्धिमान को चाहिए कि पाँचवें महीने में उद्यापन करे।
उद्यापन के लिए बुद्धिमान को अपने सामर्थ्य के अनुसार स्वर्णमयी गणेश-प्रतिमा बनानी चाहिए। उसके बाद उस भक्ति सम्पन्न मनुष्य को पूर्वोक्त विधान से चन्दन, सुगन्धित द्रव्य तथा अनेक प्रकार के सुन्दर पुष्पों से पूजा करनी चाहिए और एकाग्रचित्त होकर नारियल के फल से अर्घ्य प्रदान करना चाहिए।
पायस से युक्त सूप में फल रखकर और उसे लाल वस्त्र से लपेटकर यह वायन भक्त ब्राह्मण को प्रदान करें। साथ ही स्वर्ण की गणपति की प्रतिमा भी दक्षिणा सहित उन्हें दें।
व्रत की पूर्णता के लिए एक आढ़क टिल का दान करें, उसके बाद ‘विघ्नेश प्रसन्न हों’ ऐसा कहकर देवता से क्षमा प्रार्थना करें।
इस प्रकार उद्यापन करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है और मनोवांछित सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
हे सत्तम ! पूर्व कल्प में स्कंदकुमार के चले जाने पर पार्वती ने मेरी आज्ञा से चार महीने तक इस व्रत को किया था तब पाँचवें महीने में पार्वती ने कार्तिकेय को प्राप्त किया था।
समुद्र पान के समय अगस्त्य जी ने इस व्रत को किया था और तीन माह में विघ्नेश्वर की कृपा से उन्होंने सिद्धि प्राप्त कर ली।
हे विपेन्द्र ! राजा नल के लिए दमयंती ने छह महीने तक इस व्रत को किया था तब नल को खोजती हुई दमयंती को वे मिल गए थे।
जब चित्रलेखा अनिरुद्ध को बाणासुर के नगर में ले गई थी तब ‘वह कहाँ गया और उसे कौन ले गया’–यह सोचकर प्रदुम्न व्याकुल हो गए। उस समय प्रदुम्न को पुत्र शोक से पीड़ित देखकर रुक्मिणी ने प्रेम पूर्वक उससे कहा–‘हे पुत्र ! मैंने जो व्रत अपने घर में किया था उसे मैं बताती हूँ इसे ध्यानपूर्वक सुनो।’
‘बहुत समय पहले जब राक्षस तुम्हें उठा ले गया था तब तुम्हारे वियोगजन्य दुःख के कारण मेरा ह्रदय विदीर्ण हो गया था। मैं सोचती थी कि मैं अपने पुत्र का अति सुन्दर मुख कब देखूँगी।
उस समय अन्य स्त्रियों के पुत्रों को देखकर मेरा ह्रदय विदीर्ण हो जाता था कि कहीं अवस्था साम्य से यह मेरा ही पुत्र तो नहीं। इसी चिंता में व्याकुल हुए मेरे अनेक वर्ष व्यतीत हो गए।
तब दैवयोग से लोमश मुनि मेरे घर आ गए। उन्होंने सभी चिंताओं को दूर करने वाला संकष्टचतुर्थी का व्रत मुझे विधिपूर्वक बताया और मैंने चार महीने तक इसे किया। उसी के प्रभाव से तुम शंबरासुर को युद्ध में मारकर आ गए थे।
अतः हे पुत्र ! इस व्रत की विधि जानकर तुम भी इसे करो, उससे तुम्हे अपने पुत्र का पता चल जाएगा।’
हे विप्र ! प्रदुम्न ने यह व्रत करके गणेश जी को प्रसन्न किया तब नारद जी से उन्होंने सुना कि अनिरुद्ध बाणासुर के नगर में है।
इसके बाद बाणासुर के नगर में जाकर उससे अत्यंत भीषण युद्ध करके और संग्राम में शिव सहित बाणासुर को जीत कर पुत्रवधू सहित अनिरुद्ध को प्रदुम्न घर लाये थे।
हे मुने ! इसी प्रकार अन्य देवताओं तथा असुरों ने भी विघ्नेश की प्रसन्नता के लिए यह व्रत किया था। हे सनत्कुमार ! इस व्रत के समान सभी सिद्धियाँ देने वाला इस लोक में कोई भी व्रत, तप, दान और तीर्थ नहीं है।
बहुत कहने से क्या लाभ ? इसके तुल्य कार्यसिद्धि करने वाला दूसरा कुछ भी नहीं है। अभक्त, नास्तिक तथा शठ को इस व्रत का उपदेश नहीं करना चाहिए अपितु पुत्र, शिष्य, श्रद्धालु तथा सज्जन को इसका उपदेश करना चाहिए।
हे विप्रर्षे ! हे धर्मिष्ठ ! हे विधिनंदन ! तुम मेरे प्रिय हो तथा लोकोपकार करने वाले हो, अतः मैंने तुम्हारे लिए इस व्रत का उपदेश किया है।’
॥इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में ‘चतुर्थीव्रत कथन’ नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥२२॥
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श्रावण अमावस्या
इस अध्याय में पढ़िये–को किये जाने वाले वृष पूजन और कुश ग्रहण का व ईश्वर बोले–‘हे सनत्कुमार ! श्रावण मास में अमावस्या के दिन जो करणीय है, उसको तथा प्रसंगवश जो कुछ अन्य बात मुझे याद आ गई है, उसको भी मैं आपसे कहता हूँ।
पूर्वकाल में अनेक प्रकार के महान बल तथा पराक्रम वाले, जगत का विध्वंस करने वाले तथा देवताओं का उत्पीड़न करने वाले दुष्ट दैत्यों के साथ मेरे अनेक युद्ध हुए। मैंने शुभ वृषभ अर्थात नन्दी पर आरूढ़ होकर संग्राम किए, किन्तु महाशक्तिशाली तथा महापराक्रमी उस वृषभ ने मुझको नहीं छोड़ा।
अंधकासुर के साथ युद्ध में तो नन्दी का शरीर विदीर्ण हो गया था, उसकी त्वचा कट गई, शरीर से रक्त बहने लगा और उसके प्राण मात्र बचे रह गए थे फिर भी जब तक मैंने उस दुष्ट का संहार नहीं किया तब तक वह नन्दी धैर्य धारण कर मेरा वहन करता रहा।
उसकी इस दशा को मैंने जान लिया था। उसके बाद उस अंधक का वध करके मैंने प्रसन्न होकर नन्दी से कहा–‘हे सुव्रत ! मैं तुम्हारे इस कृत्य से प्रसन्न हूँ, वर माँगो। तुम्हारे घाव ठीक हो जाएँ। तुम बलवान हो जाओ और तुम्हारा पराक्रम तथा रूप पहले से भी बढ़ जाए। इसके अतिरिक्त तुम जो-जो वर माँगोगे, उसे मैं तुम्हें अवश्य दूँगा।’
नंदिकेश्वर बोले–‘हे देवदेव ! हे महेश्वर ! मेरी कोई याचना नहीं है। आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो फिर इससे बढ़कर क्या वैभव हो सकता है। तथापि हे भगवन ! लोकोपकार के लिए मैं मांग रहा हूँ।
हे शिव ! आज श्रावण मास की अमावस्या है, जिसमें आप मुझ पर प्रसन्न हुए हैं। इस तिथि में गायों सहित उत्तम मिटटी से निर्मित वृषभों की पूजा करनी चाहिए।
आज अमावस्या के दिन जन्म लेना कामधेनु तुल्य होता है। अतः इस तिथि में वर प्रदान करें की यह अमावस्या वांछित फल देने वाली हो।
आज के दिन भक्तिपूर्वक प्रत्यक्ष वृषभों तथा गायों की पूजा करनी चाहिए। गेरू आदि धातुओं से प्रयत्नपूर्वक उन्हें भूषित करना चाहिए। उनकी सींगों पर सोना, चाँदी आदि के पत्तर मढ़े और रेशम के बड़े-बड़े गुच्छों को भी सींगों पर बांधे।
अनेक प्रकार के वर्णों से चित्रित सुन्दर वस्त्र से उनकी पीठ को ढक दें और गले में मनोहर शब्द करने वाला घण्टा बाँध दे। सूर्योदय से लगभग चार घड़ी बीतने पर गायों को ग्राम से बाहर ले जाकर पुनः सायंवेला में ग्राम में प्रवेश कराएं।
आहार के रूप में सरसों, तिल की खली आदि अनेक प्रकार का अन्न इस दिन अर्पित करें। जो इस दिन ऐसा करता है, उसका गोधन सदा बढ़ता रहता है। जिस घर में गाय ना हों वह श्मशान के समान होता है। पंचामृत तथा पंचगव्य दूध के बिना नहीं बनते है। गोबर से लेप किए बिना घर पवित्र नहीं होता।
हे सुरोत्तम ! जहाँ गोमूत्र से छिड़काव नहीं होता वहाँ चींटी आदि जंतुओं का उपद्रव विद्यमान रहता है। हे महादेव ! दूध के बिना भोजन का रस ही क्या है ? हे प्रभो ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न है तो इन वरों को तथा अन्य वरों को भी मुझे प्रदान कीजिए।’
हे सनत्कुमार ! तब नन्दी का यह वचन सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ। मैंने कहा–‘हे वृषश्रेष्ठ ! जो तुमने माँगा है सब हो जाए। हे नन्दिन ! इस दिन का जो अन्य नाम है, उसे भी सुनो।
जो वृषभ किसी के द्वारा कहीं भी किसी कार्य में प्रयुक्त नहीं किया जाता और तृण खाता हुआ तथा जल पीता हुआ जो शांतिपूर्वक विचरण करता है तथा महान वीर व बलशाली होता है उसे “पोल” कहा जाता है। अतः हे नन्दिन ! उसी के नाम से यह दिन “पोला” नामवाला होगा। इस दिन अपने इष्ट बंधुओं के साथ महान उत्सव करना चाहिए।
हे वत्स ! मैंने उस दिन ये श्रेष्ठ वर प्रदान किए थे अतः लोगों के द्वारा इस श्रेष्ठ दिन को “पोला” नामवाला कहा गया है। इस दिन सभी कामनाओ को पूर्ण करने वाला वृषभों का महान उत्सव करना चाहिए।
इसके साथ ही अब मैं इसी तिथि में किए जाने वाले कुशग्रहण का वर्णन करूँगा। श्रावण मास की अमावस्या के दिन पवित्र होकर कुशों को उखाड़ लाएं। वे कुश सदा ताजे होते हैं, उन्हें बार-बार प्रयोग में लाना चाहिए।
कुश, काश, यव, दूर्वा, उशीर, सकूदक, गेहूँ, व्रीहि, मूंज और बल्वज–ये दस दर्भ होते हैं। “ब्रह्माजी के साथ उत्पन्न होने वाले तथा ब्रह्माजी की इच्छा से प्रकट होने वाले हे दर्भ ! मेरे सभी पापों का नाश कीजिए और कल्याणकारक होइए”–इस मन्त्र का उच्चारण करने के साथ ईशान दिशा में मुख करके “हुं फट”–मन्त्र के द्वारा एक ही बार में कुश को उखाड़ लें।
जिनके अग्र भाग टूटे हुए ना हों तथा शुष्क न हों, वे हरित वर्ण के कुश श्राद्धकर्म के योग्य कहे गए हैं और जड़रहित कुश देवकार्यों तथा जप आदि में प्रयोग के योग्य होते हैं।
सात पत्तों वाले कुश देवकार्य तथा पितृकार्य के लिए श्रेष्ठ होते हैं। मूलरहित तथा गर्भयुक्त, अग्रभागवाले तथा दस अंगुल प्रमाण वाले दो दर्भ पवित्रक के लिए उपयुक्त होते हैं।
ब्राह्मण के लिए चार कुश पत्रों का पवित्रक बताया गया है और अन्य वर्णों के लिए क्रमशः तीन, दो और एक दर्भ का पवित्रक कहा गया है अथवा सभी वर्णों के लिए दो दर्भों का ग्रंथियुक्त पवित्रक होता है। यह पवित्रक धारण करने के लिए होता है, इसे मैंने आपको बता दिया है।
उत्पवन हेतु सभी के लिए दो दर्भ उपयुक्त होते हैं। पचास दर्भों से ब्रह्मा और पच्चीस दर्भों से विष्टर बनाना चाहिए। पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। आचमन के समय हाथ से पवित्रक को नहीं निकालना चाहिए।
विकिर के लिए पिंड देने तथा अग्नौकरण करने के साथ और पाद्य देने के पश्चात पवित्रक का त्याग कर देना चाहिए। दर्भ के समान पुण्यप्रद, पवित्र और पापनाशक कुछ भी नहीं है।
देवकर्म तथा पितृकर्म–ये सब दर्भ के अधीन हैं। उस प्रकार के दर्भों को श्रावण मास की अमावस्या के दिन उखाड़ना चाहिए, इससे इनकी पवित्रता बनी रहती है। श्रावण मास की अमावस्या का वर्णन क्या किया जाए।
हे सनत्कुमार ! श्रावण मास की अमावस्या के दिन जो कृत्य होता है, उसे मैंने कह दिया। श्रावण मास में और भी जो करणीय है, उसे भी मैं आपसे कहता हूँ।
॥इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “अमावस्या के दिन वृषभ पूजन-कुशग्रहण” नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥२६॥
“ॐ नमःशिवाय”
Monday, August 4, 2025
श्रावण मास माहात्म्य”
“श्रावण मास माहात्म्य”
अध्याय–24 इस अध्याय में पढ़िये–श्रीकृष्णजन्माष्टमी व्रत के माहात्म्य में राजा मितजित का आख्यान
ईश्वर बोले–‘हे ब्रह्मपुत्र ! पूर्वकल्प में दैत्यों के भार से अत्यंत पीड़ित हुई पृथ्वी बहुत व्याकुल तथा दीन होकर ब्रह्माजी की शरण में गई। उसके मुख से वृत्तांत सुनकर ब्रह्माजी ने देवताओं के साथ क्षीरसागर में विष्णु के पास जाकर स्तुतियों के द्वारा उनको प्रसन्न किया।
तब नारायण श्रीहरि सभी दिशाओं में प्रकट हुए और ब्रह्माजी के मुख से सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर बोले–‘हे देवताओं ! आप लोग डरें मत, मैं वसुदेव के द्वारा देवकी के गर्भ से अवतार लूँगा और पृथ्वी का सन्ताप दूर करूँगा। सभी देवता लोग यादवों का रूप धारण करें।’ ऐसा कहकर भगवान् अंतर्ध्यान हो गए।
समय आने पर वह देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुए। वसुदेव ने कंस के भय से उन्हें गोकुल पहुँचा दिया और कंस का विनाश करने वाले उन कृष्ण का वहीं पर पालन-पोषण हुआ।
बाद में मथुरा में आकर उन्होंने अनुचरों सहित कंस का वध किया तब पुरवासियों ने आदर पूर्वक यह प्रार्थना की–‘हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! हे महायोगिन ! हे भक्तों को अभय देने वाले ! हे देव ! हे शरणागत वत्सल ! हम शरणागतों की रक्षा कीजिए।
हे देव ! हम आपसे कुछ निवेदन करते हैं, इसे आप कृपा करके हम लोगों को बताएं। आपके जन्मदिन के कृत्य कोई कहीं भी नहीं जानता। वह सब आपसे जानकर हम सभी लोग उस जन्मदिन पर वर्धापन नामक उत्सव मनाएंगे।
अपने प्रति उनकी भक्ति, श्रद्धा तथा सौहार्द को देखकर श्रीकृष्ण ने अपने जन्मदिन के सम्पूर्ण कृत्य को उनसे कह दिया। उसे सुनकर उन पुरवासियों ने भी विधानपूर्वक उस व्रत को किया तब भगवान् ने प्रत्येक व्रतकर्ता को अनेक वर प्रदान किए।
इस प्रसंग में एक प्राचीन इतिहास भी कहा जाता है–अंगदेश में उत्पन्न एक मितजित नामक राजा था। उसका पुत्र महासेन सत्यवादी था तथा सन्मार्ग पर चलने वाला था। सब कुछ जानने वाला वह राजा अपनी प्रजा को आनन्दित करता हुआ उनका विधिवत पालन करता था।
इस प्रकार रहते हुए उस राजा का अकस्मात दैवयोग से पाखण्डियों के साथ बहुत कालपर्यन्त साहचर्य हो गया और उनके संसर्ग से वह राजा अधर्मपरायण हो गया।
वह राजा वेद, शास्त्र तथा पुराणों की बहुत निन्दा करने लगा और वर्णाश्रम के धर्म के प्रति अत्यधिक द्वेष भाव से युक्त हो गया।
हे मुनिश्रेष्ठ ! बहुत दिन व्यतीत होने के पश्चात काल की प्रेरणा से वह राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ और यमदूतों के अधीन हो गया। यमदूतों के द्वारा पाश में बांधकर पीटते हुए यमराज के पास ले जाते हुए वह बहुत पीड़ित हुआ।
दुष्टों की संगति के कारण उसे नरक में गिरा दिया गया और वहाँ बहुत समय तक उसने यातनाएँ प्राप्त की। यातनाओं को भोगकर अपने पाप के शेष भाग से वह पिशाच योनि को प्राप्त हुआ। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। भूख व प्यास से व्याकुल वह भ्रमण करता हुआ मारवाड़ देश में आकर किसी वैश्य के शरीर में प्रवेश करके रहने लगा।
वह उसी के साथ पुण्यदायिनी मथुरापुरी चला गया। वहां पास के ही रक्षकों ने उस पिशाच को उसके गृह से निकाल दिया तब वह पिशाच वन में तथा ऋषियों के आश्रम में भ्रमण करने लगा।
किसी समय दैवयोग से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन व्रत करने वाले मुनियों तथा द्विजों के द्वारा महापूजा तथा नामसंकीर्तन आदि के साथ रात्रि-जागरण किया जा रहा था, वहाँ पहुँचकर उसने विधिवत सब कुछ देखा और श्रीहरि की कथा का श्रवण किया।
इससे वह उसी क्षण पापरहित, पवित्र तथा निर्मल मनवाला हो गया। वह यमदूतों से मुक्त हो गया और प्रेत योनि छोड़कर विमान में बैठ दिव्य भोगों से युक्त हो विष्णुलोक पहुँच गया।
इस प्रकार इस व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि को प्राप्त उस राजा को विष्णु का सान्निध्य प्राप्त हुआ। तत्त्वदर्शी मुनियों ने पुराणों में इस शाश्वत तथा सार्वलौकिक व्रत का पूर्ण रूप से वर्णन किया है।
सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले इस व्रत को करके मनुष्य सभी वांछित फल प्राप्त करता है। इस प्रकार जो कृष्णजन्माष्टमी के दिन इस शुभ व्रत को करता है, वह इस लोक में अनेक प्रकार के सुखों को भोगकर शुभ कामनाओं को प्राप्त करता है।
हे ब्रह्मपुत्र ! वहाँ वैकुण्ठ में एक लाख वर्ष तक देव विमान में आसीन होकर नानाविध सुखों का उपभोग करके अवशिष्ट पुण्य के कारण इस लोक में आकर सभी ऐश्वर्यों से समृद्ध तथा सभी अशुभों से रहित होकर महाराजाओं के कुल में उत्पन्न होता है, वह कामदेव के सामान स्वरुप वाला होता है।
जिस स्थान पर कृष्ण जन्मोत्सव की उत्सव विधि लिखी हो अथवा सभी सौन्दर्य से युक्त श्रीकृष्ण जन्मसामग्री किसी दूसरे को अर्पित की गई हो अथवा उत्सवपूर्वक अनुष्ठित व्रतों से विश्वसृष्टा श्रीकृष्ण की पूजा की जाती हो वहाँ शत्रुओं का भय कभी नहीं होता है।
उस स्थान पर मेघ व्यक्ति की इच्छा करने मात्र से वृष्टि करता है और प्राकृतिक आपदाओं से भी कोई भय नहीं होता। जिस घर में कोई देवकी पुत्र श्रीकृष्ण के चरित्र की पूजा करता है, वह घर सब प्रकार से समृद्ध रहता है और वहाँ भूत-प्रेत आदि बाधाओं का भय नहीं होता है।
जो मनुष्य किसी के साथ में भी शान्त होकर इस व्रतोत्सव का दर्शन कर लेता है वह भी पाप से मुक्त होकर श्रीहरि के धाम जाता है।
॥इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “जन्माष्टमीव्रत कथन” नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥२४॥
“ॐ नमःशिवाय
Mansar Lake Jammu
Mansar Lake Jammu
Lake Mansar, together with its twin lake Surinsar, is a famous picnic place and pilgrimage destination, surrounded by deep woodland, tiny parks, a temple, and low-lying hills. It is 62 kilometers from Jammu and measures over a mile in length and half a mile in width. It shares the mythology and sacredness of Lake Mansarovar, in addition to being a famous excursion location. The Surinsar Lake and the Surinsar - Mansar Wildlife Sanctuary are also close. Mansar is an ideal place to get away from the stresses of everyday life, reconnect with nature, and find yourself.
Apart from the Umapati Mahadev & Narasimha and Durga temples, Mansar Lake is home to several smaller temples that are routinely visited by devotees. The shrine is surrounded by a large boulder on which several iron chains represent the little serpents that await the Sheshnag's deity.
To seek Sheshnag's blessings, most newlyweds believe it is auspicious to make three circumambulations (Parikarma) around the lake. Many Hindu groups hold their male children's Mundan ritual (first haircut) here. It is also widely believed that the waters of Mansar Lake may cleanse one of their sins. Lake Mansar is known for its flora and wildlife, as well as its wonderful natural setting, in addition to all of the religious and holy events. For seeing various types of fish, turtles, and seasonal birds, a well-lit concrete road with projected view desks has been built. Around 207 kinds of algae, seven species of fish, and 15 species of waterfowl live in the lake. The lovely lake is also a popular boating area.
SHESHNAG TEMPLE- MANSAR LAKE
Sheshnag temple located on the eastern bank of the Mansar Lake is dedicated to Lord Serpent. It is known for its story of bringing happiness and blessings to newlyweds and that is why, newly married couple from far and wide flock to the temple to seek divine blessings. It is also believed that anyone who dips on the holy water on Mansar Lake will be rectified and brought purity upon him/her. Sheshnag is known to possess six heads and is flanked by smaller snakes that are depicted in the form of iron chains.
MANSAR LAKE
MANSAR LAKE
MANSAR LAKE
The Mansar lake near Jammu city is one of the most famous adventure tourism destinations in India. Mansar Lake is situated 62 km from Jammu. Mansrover, is also called as Mansar. The Mansar lake is about 20 km from National Highway No. 1A. Road to Mansar Lake starts from Samba on National Highway No. 1A. All in all, it is a beautiful place to visit and your travel to Jammu should include this place in the list of places that you would want to visit for sure
The history of Mansar dates back to the time of Mahabhartata. The son of Arjun and Ulpi, (who was the daughter of King Nag), named Babar Vahan, was the ruler of this region during the ancient times of Mahabhartata.
Besides being a popular excursion destination in Jammu, it is also a holy site, sharing the legacy and sanctity of Lake Manasarovar. On the Eastern Bank of the Lake there is a shrine to Sheshnag (a snake with six heads). The shrine comprises a big boulder on which are placed a number of iron chains perhaps representing the small serpents waiting on the tutelary deity of the Sheshnag. Two ancient temples of Umapati Mahadev & Narsimha as also a temple of Durga are situated in the vicinity of the Mansar lake.
People take a holy dip in the water of the lake on festive occasions. Newlyweds consider it auspicious to perform three circum-ambulation’s (Parikarma) around the lake to seek the blessings of Sheshnag, the lord of serpents, whose shrine is located on its eastern bank.
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